|
मीरा कुमारी चौधरी
डॉ. सुनील कुमार चतुर्वेदी
Keywords:
कलात्मक सौन्दर्य, सांस्कृतिक धरोहर, पलायनवादी-प्रवर्तियाँ, आत्मनिर्भरता, सामजस्य, लोकमानस, कला व संस्कृति।
Abstract:
संस्कृति देष समुदाय समाज कि विषेष पहचान होती है। जो वहाँ के लोक जीवन को प्रदर्षित करती है। संस्कृति उन बगीयों के समान है। जहाँ कब कौनसे फूल खिल जाये । संस्कृति नित नयी सुरज की किरण के साथ बदलती व फलती फूलती है। संस्कृति के हर पहल को विकसित करने से पहले सही अर्थ समझना आवष्यक है।
ग्रामीण संस्कृति प्राचीन परम्पराओं रिती रिवाजों पौराणिक कथाओं व विधि संस्कृतियों का समावेष अनेक कलात्मकताओं के साथ देष-विदेष में अपनी विषेष पहचान बनाती है।
संस्कृति के दो भाग है। एक आन्तरिक दुसरा बाहृय सांस्कृति मानव जीवन के भीतर भावनाओं चारित्रिक गुणों का समावष होता है। तथा बाहृय संस्कृति में दृष्य श्रव्य कलाएँ और षिल्प को माना जाता है।
बदलते परिवेष में कई धार्मिक भावनाओं भक्ति जैसी संस्कृति पर प्रकाष डालने की आवष्यकता है, यहाँ की भक्ति धारा ने समाज को एक सूत्र में पिरोय रखा है एवं सगुण और निर्गुण दोनों षाखाओं में विकास हुआ।
|
|

International Journal of Recent Research and Review
ISSN: 2277-8322
Vol. XVIII, Issue 2
June 2025
|
PDF View
PUBLISHED
June 2025
ISSUE
Vol. XVIII, Issue 2
SECTION
Articles
|